एनसीईआरटी कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भूगोल अध्याय 3 हमारी बदलती पृथ्वी

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Written By Avinash Sharan

5th May 2021

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भूगोल … अध्याय 3 हमारी बदलती पृथ्वी

एनसीईआरटी कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भूगोल अध्याय 3 हमारी बदलती पृथ्वी अत्यंत ही महत्वपूर्ण पाठ है। इस हमारी बदलती पृथ्वी नामक पाठ में हम पृथ्वी के बदलते स्वरुप और उसके कारणों के बारे में पढ़ेंगे।
ये तो तुम्हे पता ही है पृथ्वी पर कोई भी चीज़ शाश्वत नहीं है।
जहाँ आज हिमालय है कभी वहां समुद्र था।
जहाँ आज समुद्र है वहां कभी लोग रहते थे।
मगर पृथ्वी का ये स्वरुप बदलता कैसे है ?
वे कौन से कारक हैं जो पृथ्वी पे बदलाव लाते हैं ?
इन्हीं सब की चर्चा आज हम इस पाठ में करेंगे।

हमारी बदलती पृथ्वी में प्रयोग होनेवाले कठिन शब्द :

प्लेट : 

क्रस्ट एवं ऊपरी मेंटल की ऊपरी परत से निर्मित 5 किलोमीटर से लेकर 200 किलोमीटर मोटाई की ठोस परत को प्लेट कहते हैं। वस्तुतः पृथ्वी का स्थलीय दृढ़ भू-खंड ही प्लेट कहलाता है।
 

अपरदन (EROSION): 

वह प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमे चट्टानों का विखंडन और परिणामस्वरूप निकले ढीले पदार्थों का जल, वायु, हिम इत्यादि द्वारा स्थानांतरण होता है। 
 

निक्षेपण 

पृथ्वी के बहिर्जात बल से संबंधित एक  प्रक्रिया हैं जिसमे अपरदित कण इकठ्ठा होकर भू-आकृति का निर्माण करते हैं।
 

अंतर्जनित बल :

 अन्तर्जात बल पृथ्वी के आन्तरिक भागों से उत्पन्न होता है। यह बल भू-तल पर विषमताओं का सृजन करता है।
 

बहिर्जात बल: 

पृथ्वी की सतह पर (बाहर) उत्पन्न होता है। यह बल भू-तल पर समतल की स्थापना करता है।

अपक्षय (Weathering):

 ताप, जल, वायु तथा प्राणियों के कार्यों के प्रभाव, जिनके द्वारा यांत्रिक व रासायनिक परिवर्तनों से चट्टानों के अपने ही स्थान पर कमजोर होने, टूटने, सड़ने एवं विखंडित होने को “अपक्षय” को अपक्षय कहते हैं।

जल प्रपात (Water Fall):

जब नदियों का जल ऊँचाई से खड़े ढाल से अत्यधिक वेग से नीचे की ओर गिरता है तो उसे जल प्रपात कहते हैं।

नदी विसर्प (Meanders):

 मैदानी क्षेत्रों में नदियों का क्षैतिज अपरदन अधिक सक्रिय होने के कारण नदी की धारा दाएँ-बाएँ, बल खाती हुई प्रवाहित होती है जिसके कारण नदी के मार्ग में छोटे बड़े मोड़ बन जाते हैं। इन मोड़ो को नदी का विसर्प कहते हैं। 

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भूगोल … अध्याय 3 हमारी बदलती पृथ्वी

स्थलमंडल का सरकना

पृथ्वी में ऊपर कुछ बड़े-बड़े ज़मीन के टुकड़े हैं।
इन टुकड़ों को हम स्थलमंडल कहते हैं। ये आपस में एक दूसरे से दूर भी हैं।
इसलिए हमने इनका अलग-अलग नाम भी रख दिया है जैसे उत्तरी अमरीका, दक्षिणी अमरीका, अफ्रीका, इत्यादि।
तुम्हे आश्चर्य होगा ये जानकार कि ज़मीन  के ये बड़े-बड़े टुकड़े एक जगह स्थिर नहीं हैं बल्कि सरकते रहते हैं।

कैसे सरकती हैं ये प्लेटें :

पृथ्वी के अंदर पिघला हुआ गर्म मैग्मा है।
यह हर वक़्त बाहर आने का प्रयास करता है।
मगर ऊपर ठोस स्थलमंडल के कारण बाहर नहीं आ पाता।
जिस प्रकार हम जब चाय पत्ती उबालते हैं तो वो उबल कर बाहर आना चाहता है।
लेकिन आंच धीमी करते ही वापस नीचे चला जाता है।
वह बाहर तो नहीं आ पाता है लेकिन वो पानी को स्थिर भी नहीं रहने देता है ।
ठीक उसी प्रकार मैग्मा भी ज़मीन को एक जगह स्थिर नहीं रहने देता है जिसकी वजह से वह कुछ मिलीमीटर सरकता रहता है https://www.drishtiias.com/hindi/to-the-points/paper1/plate-tectonics

पृथ्वी की गतियाँ :

हमारे शरीर में भी दो प्रकार की गतियाँ होती हैं।
कुछ हलचल पेट के अंदर होता है तो कभी शरीर के बाहर छिल जाता है।
उसी प्रकार पृथ्वी के अंदर भी दो तरह की गतियां होती है।
अंदर होनेवाली गति को अंतर्जनित बल (ENDOGENIC FORCE ) कहते हैं
और बाहर होने वाली गति को बहिर्जनिक बल (EXOGENIC FORCE) कहते हैं।

अंतर्जनित बल (ENDOGENIC FORCE) और हमारी बदलती पृथ्वी

अंतर्जनित बल भी दो प्रकार के हो सकते हैं – आकस्मिक या फिर धीरे-धीरे।
जब पृथ्वी के अंदर से आकस्मिक ताकत लगती  है तो उसे कोई भी रोक नहीं सकता।
वो ज्वालामुखी, भूकंप या फिर ज़मीन का खिसकना भी हो सकता है।

ज्वालामुखी

पृथ्वी के अंदर कभी इतना अधिक बल लगता है कि उसके अंदर की सभी चीज़े बाहर आ जाती है।
इसे ही हम ज्वालामुखी कहते हैं।
इससे पृथ्वी के ऊपर अचानक एक बड़ा बदलाव आ जाता है।
क्या ऐसा हमारे शरीर में भी होता है ?
पेट के अंदर गड़बड़ी के कारण अंदर से एक ऐसी ताकत लगती है जिसे कोई रोक नहीं सकता और हमें उल्टी हो जाती है।
अंदर का खाया-पिया हुआ सब बाहर आ जाता है।
यही तो है ज्वालामुखी।
क्या आप जानते हैं कि भारत के दक्कन का पठार ज्वालामुखी से नहीं बल्कि विदर विस्फोट से बना है।

भूकंप (EARTHQUAKE)

पृथ्वी के ऊपर जो स्थल का भाग है, आखिर वो भी तो किसी चीज के ऊपर ही टिका हुआ है।
इतने वर्षों से वजन ढोते -ढोते वह भी थक कर कमज़ोर हो जाता है और एक दिन टूट जाता है।
उसके टूटते ही जो भी चीज़े उसके ऊपर टिकी हुई होती हैं वो सब अचानक हिलने-डुलने लगती  हैं।
इसी को तो भूकंप कहते हैं।
ये भी ठीक उसी प्रकार होता है जैसे कभी-कभी हमारे शरीर में सिहरन होती है और पूरा शरीर कांप उठता है।
कभी किसी को दिल का दौरा (HEARTQUAKE) पड़ता है और पूरा शरीर हिल जाता है क्यों आते हैं जापान में भूकंप-ज्वालामुखी-सुनामी ?

जमीन का खिसकना (LANDSLIDE)

कभी-कभी पृथ्वी के अंदर कम्पन (VIBRATION) से पृथ्वी के ऊपर का कमज़ोर भाग अपने स्थान से खिसक जाता है।
ऐसा अक्सर पहाड़ी इलाकों में होता है।
पहाड़ का एक हिस्सा ताश की पत्तियों की तरह अचानक ढह जाता है।
इसी को ज़मीन का खिसकना कहते हैं।
जो बच्चे बालू के ऊपर बचपन में खेले हैं और बालू का मंदिर बनाये हैं उन्होंने ऐसा होते हुए देखा है।
जब कोई मंदिर के बगल से तेज़ी से दौड़ता हुआ निकल जाता है तो बालू में कम्पन की वजह से मंदिर का एक हिस्सा टूट कर ढह जाता है।
इसी को ज़मीन का खिसकना कहते हैं।

बहिर्जनिक बल (EXOGENIC FORCE) और हमारी बदलती पृथ्वी

अब तक हमने पढ़ा कि पृथ्वी के अंदर के बल से पृथ्वी के ऊपर कैसे परिवर्तन आता है।
अब हम पढ़ेंगे कि पृथ्वी के ऊपर कौन से करक हैं जो परिवर्तन लाते हैं।
पृथ्वी के ऊपर मुख्यतः दो प्रमुख कारक होते हैं।
अपक्षय (WEATHERING) और अपरदन (EROSION) . वायु, तापमान और वर्षा मुख्य रूप से चट्टानों को तोड़ने का कार्य करती हैं।
फिर उसे अपनी वेग द्वारा बहाकर एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाती है।

नदी के कार्य

नदी अपने जीवन काल में अपरदन (EROSION) और निक्षेपण (DEPOSITION) में ही लगी रहती है।
इसके जीवन को हम तीन हिस्सों में विभाजित क्रर सकते हैं।बाल्यावस्था, प्रौढ़ावस्था एवं वृद्धावस्था।

बाल्यावस्था (CHILDHOOD STAGE)

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भूगोल अध्याय 3 हमारी बदलती पृथ्वी

पहाड़ों के ऊपर हिमनद के पिघलने से नदी का जन्म होता है।
एक बच्चे की भाँती नदी साफ़, निर्बल, स्वच्छ,होती है और धीरे धीरे रेंगती हुई आगे बढ़ती है।
थोड़ी बड़ी होने के बाद वह पहाड़ों  पर से गिरती है और जल-प्रपात बनाती है।
पहाड़ों से गिरते ही नदी युवा हो जाती है।
युवा होने के कारण उसकी शक्ति अत्यधिक बढ़ जाती है। वह तोड़-फोड़ शुरू कर देती है।
कठोर से कठोर चट्टानों को भी तोड़ देती है।
जिस जगह जल प्रपात का जल गिरता है, तो उसके वेग से पहाड़ में “V “ आकार की घाटी बन जाती है।

प्रौढ़ावस्था (MATURE STAGE)

जब नदी पहाड़ को छोड़कर समतल मैदान में बहती है, उसकी गति धीमी होने लगती है।
मैदानी भाग में जहाँ भी ढलान मिलती है नदी वहीँ मुड़ जाती है।
इस प्रकार नदी सांप की तरह “S” आकार  बनाती है जिसे विसर्प कहते हैं।
इसके बाद विसर्पों के किनारों पर लगातार अपरदन और निक्षेपण का कार्य चलता रहता है जिससे विसर्प लूप नदी से कट जाते हैं।
इसे हम चापझील  (OX -BOW LAKE) कहते हैं।
बरसात के दिनों में अत्यधिक जल के कारण नदी अपने दोनों किनारों को तोड़कर चौड़ी हो जाती है।
ऐसे में नदी अपने किनारों पर मौजूद मिटटी को दूर तक फैला देती है।
इसे हम बाढ़ कृत मैदान (FLOOD-PLAIN) कहते हैं।
उसका जल आस-पास के गाँव में भी प्रवेश कर जाता है।
इसे हम बाढ़ कहते हैं।
जब वर्षा रूकती है तो नदी का जल धीरे-धीरे नीचे उतरने लगता है।

वृद्धावस्था (OLD-STAGE)

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भूगोल अध्याय 3 हमारी बदलती पृथ्वी

मैदानी भाग से होते हुए जैसे-जैसे नदी आगे बढ़ती जाती है वह बूढी होने लगती है।
उसका वेग और उसकी ताकत कम होने लगती है।
अब न तो उसमे चट्टानों को तोड़ने की ताकत बची है, न ही मिटटी को अपने साथ बहा ले जाने की।
नदी के जल में जो भी छोटे-छोटे मिटटी के कण हैं, नदी उसे भी जमा कर देती है।
अपने ही रास्ते में जमा करने की वजह से नदी का ही रास्ता बंद होने लगता है।
ऐसे में नदी सैकड़ों और फिर हज़ारों टुकड़ों में पेड़ की डालियों की तरह बँट जाती है।
कलकत्ता में बहने वाली पतली सी हुगली नदी गंगा  नदी की ही एक डाल (BRANCH) है।
समुद्र के किनारे त्रिकोण आकर में नदी फ़ैल जाती है जिसे हम डेल्टा कहते हैं।
फिर नदी समुद्र में विलीन हो जाती है और नदी का अंत हो जाता है DELTA AND ESTUARY

समुद्री लहर का कार्य (SEAWAVES) और हमारी बदलती पृथ्वी

समुद्र में लगातार लहरों का उठना और तट से टकराने के कारण अपरदन एवं निक्षेपण दोनों होता है।
इसमें उपस्थित बड़े बड़े चट्टानों से लगातार लहरें टकराती हैं जिससे वह खुरदुरा हो जाता है।
समुद्र के किनारे कोई भी चीज़ आपको चिकनी नहीं मिलेगी।
खुरदुरा होते-होते उनमे दरार पड़ जाती है।
समय के साथ दरार बढ़ती जाती है और चौड़ी हो जाती है जिसे समुद्री गुफा कहते हैं।
धीरे-धीरे ये गुफा इतनी बड़ी हो जाती है कि इसके आर-पार जाया जा सकता है।
इसे तटीय मेहराब कहते हैं।
लगातार अपरदन समय के साथ छत को भी तोड़ देता है जिससे चट्टान दो अलग-अलग हिस्सों में बंट जाता है।
इसे स्टॉक कहते हैं।
लगातार लहरें तट पर प्रहार कर उसे भी चौड़ा कर देती हैं जिससे समुद्री BEACH का निर्माण होता है।

हिमनद के कार्य (WORK OF GLACIER) और हमारी बदलती पृथ्वी

 

अगर आप मिटटी या बालू के ढेर से एक भारी बक्सा (BOX) खिसकायेंगे तो आपको बालू का ढेर कैसा दिखाई देगा?
दोनों और बालू का टीला और नीचे की तरफ बक्से के घिसने का  निशान।
अर्थात जिस रस्ते से होकर बक्सा गया है वह “U” आकार का दिखाई देगा।

हिमनद हिमोढ़:

 

ठीक इसी प्रकार पहाड़ों के ऊपर हिमनद (बर्फ का पहाड़)  (GLACIER) भारी होकर टूट जाता है।
पहाड़ों पे ढलान होने के कारण वह धीरे-धीरे खिसकने लगता है।
पहाड़ी के दोनों SIDE और नीचे को नोचते हुए आगे बढ़ता है।
हिमनद के द्वारा लाये गए पदार्थ जैसे पत्थर के टुकड़े, रेत एवं मिटटी जहां पर जमा होता है उसे हिमनद हिमोढ़ कहते हैं।
जब हिमनद ढलानों से होकर नीचे आ जाता है तो गर्मी की वजह से पिघलने लगता है।
कई वर्षों तक लगातार ऐसा होने के कारण दो पहाड़ी के बीच का फासला बढ़ता जाता है और गहरा भी हो जाता है।
यह देखने में अंग्रेजी के “U” आकार का होता है।

पवन के कार्य (WORK OF WIND) और हमारी बदलती पृथ्वी

रेत से भरे विशाल क्षेत्र को रेगिस्तान कहते हैं।
यह एक खुली जगह होती है इसलिए हवा (पवन) यहाँ पर अपरदन और निक्षेपण का कार्य प्रमुख रूप से करती है।
रेगिस्तान में छाते के आकार के शैल दिखाई देते हैं।
इसका कारण यह है कि गर्मी में कोई भी चीज़ फैलती है और ठण्ड में सिकुड़ती है।
नोट: रेगिस्तान में बालू की वजह से दिन का तापमान ज्यादा होता है क्योंकि बालू जल्दी गर्म हो जाता  है। सूर्यास्त होते ही रेगिस्तान का तापमान तेज़ी से घटने लगता है क्योंकि रेत तेज़ी से ठंडी भी हो जाती है।

छत्रक शैल का निर्माण (MUSHROOMM ROCKS)

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भूगोल अध्याय 3 हमारी बदलती पृथ्वी

छत्रक शैल – निचला हिस्सा संकीर्ण और ऊपरी हिस्सा विस्तृत

 रेगिस्तान में दिन में अत्यधिक गर्मी की वजह से बड़े बड़े चट्टान फ़ैल जाते हैं।
रात को अत्यधिक ठण्ड की वजह से चट्टान सिकुड़ती है।
इस  प्रकार लगातार दिन में फैलने और रात को सिकुड़ने के कारण चट्टान का बाहरी हिस्सा ढीला और कमज़ोर हो जाता है।
जब हवा चलती है तो रेत के भारी कण चट्टान के नीचे टकराते हैं।
वहीँ हलके कण चट्टान के ऊपर टकराते हैं।
इस वजह से चट्टान नीचे की और से ज्यादा टूटता है और ऊपर की और कम।
इससे चट्टान का निचला हिस्सा संकीर्ण और ऊपरी हिस्सा विस्तृत अर्थात गोबरछत्ते (MUSHROOM) की तरह दिखाई देता है।
इसे ही छत्रक शैल कहते हैं।

बालू टिब्बा या बालू के  टीले का निर्माण (SAND DUNES)

बालू के कण महीन और हल्के होते हैं।
जब हवा चलती है तो वह हलके कणों  को उड़ाकर दूर ले जाती है।
वेग कम होने पर रेत के कणों को दूर जमा कर देती है।
इससे बालू के छोटे-छोटे टीले बन जाते हैं जिसे बालू टिब्बा कहते हैं।

लोएस का निर्माण (LOESS)

जब वायु रेत के हलके कणों को दूर ले जाती है और उसे विस्तृत क्षेत्र में फैला देती है तो उसे लोएस कहते हैं।
भारत में राजस्थान के मरुस्थल एवं चीन में विशाल लोएस निक्षेप पाए जाते हैं।

कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भूगोल … अध्याय 3 हमारी बदलती पृथ्वी

हमारी बदलती पृथ्वी एक सहज एवं सरल पाठ है। पाठ्य पुस्तक में कुछ ऐसे कठिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है जिससे पाठ को समझने में थोड़ी कठिनाई होती है। वैसे इसमें कोई शक नहीं कि सातवीं कक्षा के भूगोल का पाठ्यक्रम आठवीं और दसवीं से भी ज्यादा कठिन है। खासकर उन शिक्षकों के लिए जिनका विषय इतिहास या फिर अर्थशास्त्र है और उन्हें सामाजिक विज्ञान पढ़ाना पड़ रहा है। वैसे मेरी कोशिश यही है कि इस पाठ को बिलकुल सरल भाषा में लिखा जाये ताकि जो भी इसे पढ़े उसे एक बार में समझ आ जाए।
अपने सुझाव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें जिससे हम और अच्छा लिखने का प्रयास करें।
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